Ax+/URN0bKYQzZP4Oo66EypEV6M8gNhoWNw4HsDBo/2yNB6vIAjyBw== SukhwalSamajUdaipur: KUMBH MELA 2019

KUMBH MELA 2019

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कुम्भ मेला-. Kumbh2019

कुंभ मेले का इतिहास 850 वर्ष पुराना है। इसकी शुरुआत आदि शंकराचार्य ने की थी ,परन्तु कुछ यह मानते हे कि   कुंभ  की  शुरुआत समुद्र के आदिकाल से ही हो गई थी। समुद्र मन्थन से अमृत निकला कलश हरिद्वार इलाहबाद  ,उज्जैन और नाशिक स्थानों पर गिरा था। इसलिए इन चार स्थानों पर कुम्भ मेला हर तीन बरस बाद भरता आया है। यह मेला किस स्थान पर भरेगा यह राशि तय करती है। वर्ष 2013 में प्रयाग ईलाहाबाद में कुम्भ मेला लगा इसका कारण भी राशियों की विशेष सहयोग  था। कुंभ मेले के लिए जो नियम निर्धारित हैं उसके अनुसार प्रयाग (इलाहबाद) में संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती तब लगता है जब माघ अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि में होते हैं और गुरू मेष राशि में होता है। अब अगला महा कुम्भ मेला 2025 में लगेगा। 




                                                                                                               


1 -जब गुरु कुंभ राशि में होता है और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब हरिद्वार(गंगा नदी  के किनारे) में कुंभ लगता है। अब अगला महा कुम्भ मेला हरिद्वार 2021  में लगेगा। 
2 -सूर्य एवं गुरू जब दोनों ही सिंह राशि में होते हैं तब कुंभ मेले का आयोजन नासिक (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर लगता है। अब अगला कुंभ मेले 2027 में  लगेगा। 
3 -गुरु जब कुंभ राशि में प्रवेश करता है तब उज्जैन (शिप्रा नदी  के किनारे ) में कुंभ लगता है।अब अगला कुंभ मेले 2030 में  लगेगा।
4 -गुरू एक राशि लगभग एक वर्ष रहता है। इस तरह बारह राशि में भ्रमण करते हुए उसे 12 वर्ष का समय लगता है। इसलिए हर बारह साल बाद फिर उसी स्थान पर कुंभ का आयोजन होता है। 
लेकिन कुंभ के लिए निर्धारित चार स्थानों में अलग-अलग स्थान पर हर तीसरे वर्ष कुंभ का अयोजन होता है। कुंभ के लिए निर्धारित चारों स्थानों में प्रयाग  (इलाहबाद ) के कुंभ का विशेष महत्व है।
इसके अलावा अर्धकुम्भ मेला भी भरता है। कुंभ मेला 2019 में प्रयाग (इलाहबाद)  जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती है भरेगा, जिसका जिसका कार्यकम निम्न हे-

अगर आप कुंभ मेले में आते हे तो इन धार्मिक स्थानों पर भी अवश्य जाये -

  - प्रयागराज-
त्रिवेणी संगम की नगरी प्रयागराज में कुंभ महापर्व में श्रद्धालु जुटने लगे हैं. प्रयागराज में अनेक तीर्थस्थल और दर्शनीय स्थल हैं
चंद्रशेखर आजाद पार्क
विक्टोरिया स्मारक-
स्वराज भवन
आनंद भवन-
संकटमोचन हनुमान मंदिर
भारद्वाज आश्रम-
श्री वेणी माधव मंदिर-
शंकर विमान मण्डपम-
मनकामेश्वर मंदिर-
श्री अखिलेश्वर महादेव-
पब्लिक लाइब्रेरी-
इलाहाबाद विश्वविद्यालय-
1-चित्रकूट (129 KM) ,2 - नैमिषारण्‍य  (253 KM ) ,3 -अयोध्या(167KM ), 4 -बौद्धगया  (364KM ), 5 -देवो की नगरी बनारस (120KM )

1-चित्रकूट (129 KM) :-Image result for free image of chitrakoot

 चित्रकूट उत्तर भारत की सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। इसमें पांच गांवों सहित एक विशाल क्षेत्र शामिल है  सीतापुरकरवीनायागांवकामता और खोही। क्षेत्र के चारों ओर विंध्य पर्वत पर्वत श्रृंखला है। मिश्रित वन सभी दिशाओं में फैल गए। पवित्रता का एक आभा जगह से घिरा हुआ है। ग्रामीण इलाकों में निवासियों और आगंतुकों के समान ही एक असाधारण शक्ति है। आजमुख्य तीर्थस्थलराम घाटमंडकीनी नदी के तट पर चित्रकूट का पर्याय बन गया है। यह छोटानींद वाला गांव कई किंवदंती और महाकाव्य से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि महाकाव्य रामायण के प्रमुख नाटककार व्यक्ति राम और सीता ने चित्रकूट के आसपास के जंगलों में अपने 14 साल के निर्वासन में से 11 साल बिता I

2-नैमिषारण्‍य  (253 KM) :

Image result for free image of naimisharanyaवाल्मीकि-रामायण में 'नैमिषनाम से उल्लिखित इस स्थान के बारे में कहा गया है कि श्री राम ने गोमती नदी के तट पर अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किया था- 'ऋषियों के साथ लक्ष्मण को घोड़े की रक्षा के लिये नियुक्त करके रामचन्द्र जी सेना के साथ नैमिषारण्य के लिए प्रस्थित हुए।महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर और अर्जुन ने इस तीर्थ-स्थल की यात्रा की थी। 'आइने अकबरीमें भी इस स्थल का वर्णन मिलता है। हिन्दी साहित्य के गौरव महाकवि नरोत्तमदास की जन्म-स्थली (बाड़ी) भी नैमिषारण्य के समीप ही स्थित है

3 -अयोध्या(167KM:

Image result for free image of ayodhya Image result for free image of ayodhyaभगवान राम जन्मस्थान के अयोध्या और भारत में सात सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। लखनऊ के 135 किलोमीटर पूर्व में सारायू के तट पर स्थित अयोध्या को प्राचीन काल में साकेत कहा जाता था। अयोध्या महाकाव्य रामायण समेत कई किंवदंतियों और कहानियों में उल्लेख पाता है।भारत का सबसे बड़ा त्यौहार, दीवाली, अयोध्या में वापस आ सकता है जब पूरे शहर ने विजयी राम का स्वागत करने के लिए मिट्टी के दीपकों के साथ गड़बड़ी की, जो रावण को मारने के बाद घर लौट आए।

4 -गयाजी एवं बोद्धगया (364KM)


Image result for free image of gayajiImage result for free image of gayajiपितरों की मुक्ति का प्रथम और मुख्यद्वार कहे जाने की वजह से गया में पिंडदान का विशेष महत्व है।हिंदू धर्म में पितृपक्ष को शुभ कामों के लिए वर्जित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म कर पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों की सोलह पीढ़ियों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिल जाती है। इस मौके पर किया गया श्राद्ध पितृऋण से भी मुक्ति दिलाता है।

आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष श्राद्ध या महालया पक्ष कहलाता है। हिंदू धर्म और वैदिक मान्यताओं में पितृ योनि की स्वीकृति और आस्था के कारण श्राद्ध का प्रचलन है।हिंदू मान्यताओं के अनुसारपिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग है। ऐसे तो देश के कई स्थानों में पिंडदान किया जाता हैमगर बिहार के फल्गु तट पर बसे गया में पिंडदान का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था। बोधगया का पवित्र शहर बिहार में स्थित है। यह गया शहर से 12 किमी दूर है। बोधगया वह जगह है जहां भटकने वाले राजकुमार सिद्धार्थ ध्यान के लिए बोधी वृक्ष के नीचे बैठे थे। उनके ध्यान के पहले तीन दिन और ज्ञान के निम्नलिखित सात सप्ताह बोधगया के विभिन्न स्थानों से निकटता से जुड़े हुए हैं। इस शहर का इतिहास 500 ईसा पूर्व वापस देखा जा सकता है। इतिहास में बोधगया को बोधिमंद और मुख्य मठ बोधिमंद-विहारा के रूप में उल्लेख किया गया है।

5 -देवो की नगरी बनारस (120KM )

Image result for free image of banaras बनारस जहां की गलियों में आज भी संस्कृति और परंपरा का रस बरसता है। गंगा किनारे बसी बाबा विश्वनाथ की नगरी को घटों और गलियों का शहर कहा जाता है। जितने घर हैं उतने मंदिर। कहते हैं काशी के कंकड़-कंकड़ में शिव का वास है। यहां भारत की सभी संस्कृतियांपरंपराएं लघु-दीर्घ रूप में जरूर मिलेंगे। और यही इसकी खासियत है। बनारस हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है तो सारनाथ बौद्धधर्मावलंबिंयों की देवभूमि। कला-संगीत और शिक्षा की भागीरथी भी यहां से निकलती है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि

वाराणसी में मृत्यु होने पर सीधे मोक्ष प्राप्ति होती है। यही कारण कि लोग अपना अंतिम समय शिवधाम में बिताना चाहते हैं। 

KUMB MALA ALLAHABAD -BATHING DATE